Hum bhi kuch kahen....

दिल की आवाज....

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Malik Parveen


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बहू भी आखिर बेटी ही होती है

Posted On: 29 Mar, 2014  
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फरेबी जज्बात ……

Posted On: 30 Nov, 2013  
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कब होगा ये सपना पूरा ….

Posted On: 10 Sep, 2013  
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राखी का त्यौहार….. अनमोल रिश्ता !

Posted On: 18 Aug, 2013  
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ये भ्रष्टाचार ……..

Posted On: 7 Aug, 2013  
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माँ कहती थी ………

Posted On: 3 Aug, 2013  
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बेटियाँ मासूम बेटियाँ ……

Posted On: 29 Jul, 2013  
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ये देश में कैसा बदलाव हुआ …

Posted On: 2 Jun, 2013  
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कहीं खो गया है वो भारत महान …….

Posted On: 24 May, 2013  
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बेनाम रिश्ते …

Posted On: 16 May, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: AJAY KUMAR CHAUDHARY AJAY KUMAR CHAUDHARY

आदरणीय परवीन जी, सादर ! ""इतने सारे क्यूँ मैं सिर्फ पुरुष समाज से नहीं कर रही हूँ बल्कि समाज का हिस्सा महिलाओं से भी कर रही हूँ .. क्या कारन है कि आप महिलाओं को ये सब सवाल करने पड़ते हैं ?? क्या आप कमजोर हैं या फिर बस सहन करना ही पड़ेगा की सोच बना के चली हुयी हैं ! खुद में हिम्मत जगाएं , खुद के अन्दर की समझ को जगाएं और खुद को यूँ न इस्तेमाल की वस्तु बनायें ….. पाश्चात्य सभ्यता की इतनी आदी न हों ! भारतीय नारी बने ! आप नारी हो नारी की भी कुछ सीमायें होती हैं सीमाओं का मतलब अब फिर से खुद को बेड़ियों में जकड़ने से नहीं है … बल्कि आप अपनी सीमायें खुद बनायें जिनको कोई भी दरिंदा पार ना कर पाए और आपकी इज्ज़त से खिलवाड़ ना कर पाए !"" बहुत सुन्दर ! आपके इन विचारों की जितनी भी प्रशंसा करूँ, वह कम है ! यही नारी का सौन्दर्य और उसकी गरिमा है ! सादर !

के द्वारा: shashi bhushan shashi bhushan

के द्वारा: Malik Parveen Malik Parveen

के द्वारा: Shweta Shweta

पाश्चात्य सभ्यता की इतनी आदी न हों ! भारतीय नारी बने ! आप नारी हो नारी की भी कुछ सीमायें होती हैं सीमाओं का मतलब अब फिर से खुद को बेड़ियों में जकड़ने से नहीं है … बल्कि आप अपनी सीमायें खुद बनायें जिनको कोई भी दरिंदा पार ना कर पाए और आपकी इज्ज़त से खिलवाड़ ना कर पाए ! अपने पहनावे का खास ख्याल रखे जो भी आजकल फैशन का दौर चल रहा है उससे परहेज करे … याद रखे की औरत की खूबसूरती उसके साज श्रृगार से नहीं बल्कि उसकी सादगी में होती है ! बदन दिखाऊ पहनावा आपकी सुन्दरता को कुछ लोगों की नज़र में भले ही बढ़ा रहा हो लेकिन असल में वो आपकी इज्ज़त को उछाल रहा है ! दुल्हन हमेशा घूँघट में इसीलिए होती है की उसकी सुन्दरता को किसी की बुरी नज़र न लगे ! अब घूँघट का मतलब ये मत समझ लेना की खुद को नकाब में रखना है लेकिन जितना हो सके मर्यादित रहें …तभी महिला दिवस की सार्थकता सिद्ध होगी !

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रोटी की कीमत उस शख्स से पूछो जो कभी रातों को भूखे पेट सोया हो भरपेट खाने वाले अक्सर झूट बोल दिया करते हैं ! आज मैंने कही पढ़ा/देखा- भूखे पेट वाले के लिए रोटी ही भगवान् है! कवि शशिभूषण जी के शब्दों में “सूरज कैसा दीखता है? कलुआ बोला – रोटी जैसा! चन्दा मामा कैसा है? कलुआ बोला – रोटी जैसा! पैसा कैसा दीखता है कलुआ बोला – रोटी जैसा! और क्या कहने सुनने की जरूरत है? लोग तो अक्सर झूठ बोल दिया करते हैं! आदरणीय परवीन जी , कितने सारे सवाल दीखते हैं इस रचना में ! सही कहा आपने लोग तो अक्सर झूठ बोल दिया करते हैं , दिल को बहला लेते हैं ! बहुत सुन्दर ! और आपकी ही पोस्ट पर आदरणीय श्री जवाहर सिंह जी की भी प्रतिक्रिया मिली , कितनी सुन्दर ! वाह ! बधाई आप दौनों को

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के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

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आदरणीया ,...सादर अभिवादन इतनी सुन्दर रचना पर क्या कहूं ?.......शायद कोई प्यारे प्रश्नों का जबाब नहीं दे सकता है ,...एक संभावित जबाब प्रतीक्षा हो सकता है .... दूसरा मूरखता भी हो सकता है ,....फिर भी पहले का महत्व कम नहीं लगता .....अति सुन्दर रचना पर श्रद्धेय डॉ. तुकबंद का अनुसरण करते हुए तुकबंदी का प्रयास करता हूँ ... अपनों का दर्द उनकी बेचैनी नींद उड़ाते हैं सवाल छलनी करते हैं तो जबाब भी आयेंगे इन्तजार करना होगा, दर्द और बढ़ने दो मिटने दो कुछ तभी कुछ और लायेंगे .... गुनाहगार प्रियतम से इतनी मोहब्बत ठीक नहीं प्रीति के मालिक भगवान हैं वो तो उसे बचायेंगे पत्थर समझ हमने जिसको खुदा बनाया वो जिन्दा मूरख निकला ये क्यूं समझायेंगे ......... मोहब्बत पर यकीन करो फूंककर दीपक नहीं परखे जाते उजाले अंधेरों से नहीं डरते चाहे औकात जुगनू से कम हो ........अरे ये तो शेर हो गया ,... थोड़ी दाद तो बनती है ............बहुत अच्छी रचना के लिए सादर अभिनन्दन वन्देमातरम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

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वासुदेव जी नमस्कार, मैं कोई भी टोपिक बहस के लिए नहीं लिखती हूँ बल्कि मेरे मन में जो भाव होते हैं उनको प्रकट करती हूँ.... बहस करने के लिए पर्याप्त जानकारी की जरुरत होती है इतनी जानकारी न मुझे है और न ही इतनी जानकारी जुटाने का समय है ... मेरा तो बस इतना ही कहना है की कोई भी धर्म हमें मार काट या बुरे का पाठ नहीं सिखाता बस हम अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सब कर जाते हैं ... कमी इंसान में होती है किसी भी धरम में नहीं ... हो सकता है की आप लोगो मेरी बात से सहमत न हो पर मेरा मन्ना अटल है की कोई भी कौम बुरी नहीं होती . वेसे तो मैं हिन्दू हूँ लेकिन मैं इंसान को अहमियत देती हु कौम को नहीं ... समय देने के लिए आपका हार्दिक आभार ...

के द्वारा: mparveen mparveen

परवीन जी, हिन्दू मुस्लिम ईसाई भाई भाई" भारत का सदैव स्वप्न रहा है.... इसी आधार पर स्वतन्त्रता के पश्चात बहुसंख्यकों ने सदियों के अत्याचार को भुला कर मुस्लिम ईसाई सब को बराबर जगह दी, गले लगाया। यह आदर्श है, किन्तु सच नहीं हो पा रहा है। क्यों...??? आपने कहा इंसान होता है कौम नहीं.... मेरे अनुसार कोई इंसान बुरा नहीं होता, उसे संकीर्ण मानसिकता बुरा बनाती है और यदि यह मानसिकता बहुलता मे हो तो निश्चित रूप से कौम को अपने आप की समीक्षा करनी चाहिए। आखिर आपने कभी सोचा है कि क्यों पूरे विश्व मे कहीं भी मुस्लिम एक जाति के रूप मे सुख से नहीं है? क्यों बहुलता होते ही उन्हें एक पृथक देश की आवश्यकता होने लगती है? अफ्रीका, यूरोप, रूस, चीन, भारत...... आपने कुछ उदाहरण दिए मुसलमानों के नाम पर--- ऐसे नाम पर्दा डालने के लिए ही सिखाये जाते हैं। टीपू सुल्तान; एक धर्मान्ध कट्टर मुसलमान जिसने हिन्दुओं का जीना दूभर कर दिया। टीपू अंग्रेजों के खिलाफ अपना राज्य बचाने के लिए लड़ा इससे महान नहीं बन जाता भले ही आधुनिक इतिहासकार उसे स्वतन्त्रता सेनानी के रूप मे प्रस्तुत करें। यहाँ संभव नहीं कि उसकी करतूतों की व्याख्या कर सकूँ.... शाहजहाँ; उसने ताजमहल लालकिला बनवाए... राजा अपने लिए किले बनवाए या अपनी बेगम के लिए कब्रगाह.... इससे वह इस योग्य नहीं बन जाता कि उसका उदाहरण दिया जाए, हाँलाकि उसने बनवाए भी अथवा नहीं यह विवादित है। किन्तु इतना तय है कि ताजमहल की कीमत भले ही कितनी हो किन्तु इतना तय है कि उसके राज्य मे लोग भूखों मर रहे थे। अब्दुल हमीद, शाहजहाँ का सरकारी इतिहासकार लिखता है- जीवन एक रोटी मे बिक रहा था कोई खरीददार नहीं था, कुत्ते का मांस बकरी के मांस की जगह बिकता था। एक सख्स जिसने गद्दी पाने के लिए अपने भाई की आँखें फोड़ डाली बाद मे बेचारे अंधे की गर्दन कटवा ली... जो हरम मे हजारों लूटी हुई औरतें रखता था (भले ही उसे प्यार का फरिश्ता लोग समझ बैठते हों), 30 साल मे 48 लड़ाइयाँ छेड़ीं... ऐसा कैसे हो सकता है कि आप उसे मुसलमानी आदर्श बताएं..? आज़ादी की जंग जिसने शुरू की वो कौन मुसलमान था... मैं समझ नहीं सका और आपने नाम नहीं लिखा..!! तराना-ए-हिन्द लिखने वाले इकबाल की बात ही मत करिए..., विभाजन के समय जनाब का गीत हिन्दी हैं हम वतन हैं से बदलकर मुस्लिम हैं हम.... हो गया। ये गीत अभी भी आपको मिल जाएगा। कट्टरपंथ का नशा इतना कि ईरान तक की इस्लामी क्रांति का शुरूर पाकिस्तान मे भरने वाले आप ही थे। शेरों मे भी नहीं चूकते थे.... ऐसा ही बहुत कुछ है.... ये उदाहरण नहीं बन सकते! आपको उदाहरण देने ही थे तो असफाक उल्ला और अब्दुल हमीद अथवा आज के अपने कलाम साब और इनके जैसे, हाँलाकि मुझे अभी याद नहीं आ रहे, नहीं ठीक थे क्या? असफाक भले ही इस्लामी विचारधारा के लिए कट्टर न हो और पुनर्जन्म की बात करता हो अथवा कलाम साब भले ही मंदिर मे मत्था टेकते हों किन्तु उदाहरण यही है क्योंकि वे विचारधारा के दुराग्रह से नहीं बंधे... इनका ही अनुसरण आज मुसलमानो को करना चाहिए.... इंसान मे कोई बुराई नहीं होती बुराई तो मानसिकता मे होती है...!!! स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई॥

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

प्रवीन मलिक, नमस्कार. मैं आप की बात से सहमत हूँ के कोई कौम बुरी नहीं होती बुरा इंसान होता है. हर कौम, हर धर्म हमें प्रेम और भाईचारे का सन्देश देता है. किसी ख़ास कौम और धर्म को निशाना बनाना गलत है. प्रवीन जी, किसी भी कौम का इंसान जब इंसानियत को छोड़ कर शरियत की काली पट्टी आँखों बाँध लेता तब वह कट्टरता का मार्ग अपना लेता है. कट्टरता चाहे धर्म की हो, चाहे जाति की, भाषा की हो, चाहे क्षेत्र की हो समाज के लिए बुरी होती है. हम यह भूल जाते हैं के धर्म इंसान को जोड़ने के लिए है न की तोड़ने के लिए. ना तुम हिन्दू बनो ना तुम बनो मुसलमान बस तुम बन जाओ एक सच्चे इंसान इंसान को प्रेम और भाईचारे का सन्देश देती आप की सुन्दर रचना के लिए आप को बधाई और शुभकामनाएं. नमस्ते जी. जय हिंद.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

के द्वारा: mparveen mparveen

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आदरणीय परवीन जी, सादर नमस्कार। हम तो आपकी बातें मान लेंगे। आपके विचारों पर यकीन कर लेंगे। पर क्या वह ऐसा करेंगे, शायद नहीं। क्या वह स्वीकार करेगे कि धर्म से बड़ा देश है? क्या वह मानेगे कि हिन्दु काफिर नहीं हैं? हम आज भी उनकी मस्जिदों और मजारों को सजदा करते हैं,  क्या वह हमारे धर्म स्थलों को उसी दृष्टि से देख सकते हैं, जिस दृष्टि से हम उनके धर्म स्थलों को देखते हैं? मैं यह नहीं कहता  कि उनमें अच्छे एवं देशभक्त लोग नहीं हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे है जो भारत के लिये कलंक हैं और जब वे भारत के ऊँचे पदों पर विराजमान हो जाते हैं तो चिन्ता होने लगती है। आजम खान जो  माँ को डायन तक कह जाते हैं। कभी उन्हें काँग्रेस इनाम के रूप में उत्तर प्रदेश का राज्यमंत्री बना देती है और सापा उत्तर प्रदेश का  केविनेट मंत्री। बूखारी साहब खुले आम भारत विरोधी बयान देते हैं और हमारी सरकारें खामोश रहती हैं और यहाँ तक कि वोट के लिये उनके दरवाजे पर घंटों खड़े रहते हैं। मुम्बई की घटना ने तो विचलित ही कर दिया है। कहीं यह दूसरे  पाकिस्तान के बनने की शुरूआत तो नहीं है।  यह जो कुछ हो रहा है, व्यवस्था की कमी के कारण हो रहा है। यदि यह व्यवस्था शीघ्र नहीं बदली गई तो भारत के अस्तित्व के लिये  खतरा उत्पन्न हो जायगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: mparveen mparveen

आजकल सब खास फल या मिठाई पहले से ही फ्रीज़ में रखी होती है ! आदरणीय परवीन जी .... सादर अभिवादन ! आजकल सब खास फल या मिठाई पहले से ही फ्रीज़ में रखी होती है ! माफ कीजियेगा आपकी यह बात ठीक नहीं लगी मुझको जब हम लेख लिखते है तो हमारी दृष्टि खुद से उपर उठ कर सर्व व्यापक नहीं तो व्यापक तो होनी ही चाहिए ... ऐसे भी लोग है जोकि अच्छे बिस्तर तथा नए बर्तन + धन ऐसे खास मौको पर परिचितों तथा पड़ोसियों से उधार मांग कर लाते है .... बच्चे पुरे मौसम में फल का स्वाद नहीं चख पाते .... उन बच्चों के लिए घर में किसी मेहमान का आना सुखद ही होता है फिर भले ही उनके माता पिता के लिए वोह परेशानी का सबब हो ..... चाहे कुछ भी हो जाए मेरा तो यही सुझाव है की घर की मुंडेर पर बैठे काले कोवे को भगाने की कोशिश कभी भी नहीं की जानी चाहिए हा हा हा हा हा हा हा :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

प्रवीण जी, सादर नमस्कार, अतिथि आज के वक्त में भी देवता ही है.मगर कुछ अनचाहे अतिथि होते हैं तब स्थिति विकट हो जाती है. जबकि कुछ मेहमानों के आने का इन्तजार आज भी बच्चों और बड़ो को अवश्य रहता है. हाँ पास पड़ोस के लोगों में आपके मेहमानों के प्रति रूचि में अंतर आया है. और खान पान की बात तो अब पहले पूछना पड़ता है कि डायबिटीज या ब्लड प्रेसर तो नहीं है? खाने में कोई परहेज तो नहीं है? अक्सर पचास पार के लोगों के साथ इस प्रकार कि समस्याएँ भी जुड़ ही जाती हैं. अंत में ही कहूंगा कि मेहमान मेहमान में भेद है. सभी को हम एक नजर से नहीं देख सकते. फिर भी आपने पुरानी यादें ताजा कर दी ... मुझे तो दो केले, दो रसगुल्ले, या दो गुलाबजामुन ही चाहिए थे ... और वो मुझे आराम से मिल जाते थे ... जाते समय वही अतिथिदेव कुछ दक्षिणा भी दे जाते थे तब कितनी खुशी होती थी, ... पर आज सबकुछ उल्टा पुल्टा हो गया है फिर भी आपसे निवेदन करूंगा की अप्रिय सत्य न लिखिए ... चाय पीने के लिए अपने घर पर न सही ब्लॉग पर ही बुलाइए कुछ मीठा और नमकीन भी रख जाइए! आदर सहित!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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आदरणीय प्रवीन जी, सादर ! ऊपरवाला तो हमें बिना मांगे ही इतना देता है की हम समेट नहीं पाते ! ये बादल, ये बरसात, ये सूरज, ये चाँद, ये सुहानी हवा, खिलखिलाती धुप, अन्न, पेड़-पौधे, फूल-पत्तियाँ, पहाड़-खाइयां, नदी-सागर, वगैरह-वगैरह....... क्या नहीं दिया उसने ! इतने तरह के प्राणी ! सबके भोजन की व्यवस्था ! अब और क्या चाहिए ! अगर इतने के बाद भी हम असंतुष्ट हैं या हमें और कुछ चाहिए तो उसकी भी उसने व्यवस्था की है ! हमें बुद्धि दी है, विवेक दिया है ! हमें तो सदैव उसका शुक्रगुजार होना चाहिए ! ""एक बार सच्चे दिल से दुआ के लिए हाथ तो उठाओ , कभी किसी से कुछ भी मांगने की जरुरत नहीं पड़ेगी दोस्तो !!"" बहुत सुन्दर रचना ! हार्दिक बधाई !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: mparveen mparveen

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के द्वारा: mparveen mparveen

Very Good Morning Mam खुदा भी क्या करे , किस किस की सुने , किस किस को दे , बन्दे भी कुछ कम नहीं , याद ही, सब जरुरत में करते हैं !! एक बार सच्चे दिल से दुआ के लिए हाथ तो उठाओ , कभी किसी से कुछ भी मांगने की जरुरत नहीं पड़ेगी दोस्तो !! काश के ऐसा होता प्रवीण मैम..................... याद तो सब जरूरत में ही करते है, सही कहा है , लेकिन वो भी तो जरूरत में ही याद करते है , जिन्हें खुदा सब कुछ दे देता है ...........क्या कोई है ऐसा इस दुनिया में जो बिना जरूरत के खुदा को याद करे ................कोई नही है , निस्वार्थ प्रेम तो खुदा से कोई भी नही करता , और सच्चे दिल से मांगो तो सब मिल जाता है, ऐसा भी कुछ नही है, खुदा को जिसे जो देना होता है वो खुद देते है, कोई सच्चे दिल से मांगे या न मांगे ................उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता ...........!

के द्वारा: sonam sonam

दिनेश जी नमस्कार, बिलकुल सही कहा आपने .... जब हम बच्चे थे तो अक्सर देखते की गली के किसी नुकड़ पर ४-५ आदमी बैठे हैं उनमे से एक जो थोडा पढ़ा लिखा है वो अखबार थामे देश और दुनिया की खबरे सबको बता रहा है और बाकि लोग सुन रहे हैं ... सुनने के बाद सब थोडा चिंतन करते हैं की अरे देश की ये हालत हो गयी है हमें तो किसी ने बताया नहीं ... हमारे देश में इतनी सारी परेशानियाँ हैं और हम तो अपनी ही २-४ परेशानियों से घिरे होकर चिंता में जले जा रहे थे ... कुछ देर विचार विमर्श करते हैं और फिर अपने अपने घर जाके लस्सी का गिलास पीके चादर तानकर सो जाते हैं की हम अनपढ़ मुर्ख क्या सोचेंगे देश के बारे में ये काम हमारा नहीं है .... ये सोच आज पढ़े लिखे और हर जागरूक इंसान की हो गयी है जो सब जनके भी अनजान बना रहता है ... तो उठिए , जागिये , बहुत हुआ अब ...

के द्वारा: mparveen mparveen