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आखिर एक स्त्री ….

Posted On 12 Aug, 2016 कविता में

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शाम ठिठक गई थी
मेरे आँगन में
लेने को मुझसे विदाई
पर मैं तो मुझमें थी ही नहीं
मुझमें थी एक माँ
जो चिंतित थी
बाहर जोर की बारिश देख
“भीग जायेगा मेरा बच्चा”
यही सोचकर ….!
मुझमें फिक्रमंद थी एक औरत
दौड़ रही थी यहाँ-वहाँ
निपटाने को अपने सौ काम
मुझमें बाट जोहती एक पत्नी
आखिर क्यों हो जाते हैं
अक्सर ये लेट …!
मुझमें परेशां थी एक गृहिणी
फ़ैल गयी थी गमलों की मिट्टी
तेज़ बारिश की बौछारों से
वो शाम हौले से मुस्काई
और चली पड़ी अपनी डगर
आखिर कितनी राह देखती मेरी
कितने चक्र तोड़ती
मुझसे मिलने को क्योंकि
मुझसे मैं भी कहाँ मिल पाती हूँ
बरसों लग जाते हैं मुझे
मुझसे ही मिलने में और फिर
अब मुझमें मेरा वजूद भी
अधूरा सा लगता है अकेली का
मैं गर संपूर्ण हूँ तो बस
इसी तरह दूसरों में उलझी
खुद से अनजान सी
थोड़ी हैरान थोड़ी परेशान सी
क्योंकि मैं मुझमे होकर भी
नहीं होती हूँ एक स्त्री हूँ ना …..!!
प्रवीन मलिक

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