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बिन बेटियां कहाँ बढ़ेगी वंशबेल ......

Posted On: 30 Jul, 2014 Others में

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सावित्री अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ी ! धनपति भागकर बहु को उठाती है और डॉ को बुलाने को दौडती है ! घर के बाहर ही धनपति को इमरती देवी मिल जाती है जो की धनपति की अच्छी सहेली होने के साथ साथ दाई भी है ! गाँव में ऐसा कौन होगा जिसने इमरती देवी के हाथो जन्म न लिया हो ! सभी गाँव वाले उसको इमरती काकी कहकर बुलाते हैं ! धनपति को दौड़ते हुए देखकर इमरती काकी पूछ बेठी अरे धन्नो कहाँ भागी जा रही है न राम राम न श्याम श्याम …….
धनपति देवी : अरे काकी क्या बताऊँ बहु अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ी बस डॉ को ही बुलाने जा रही थी जल्दी जल्दी में आपको देखा ही नहीं !!
इमरति काकी : अरे रुक … चल मैं देखती हूँ क्या हुआ है बहु को … तुम्हे तो पता है न कि मैं तो नाडी देखकर ही बता दूंगी क्या हुआ होगा बहु को .. चल घर चल जल्दी …
( दोनों घर के अन्दर तेजी से प्रवेश करती हैं )
इमरती काकी सावित्री की नब्ज देखती है और फिर पेट पर हाथ लगाकर देखती है और ख़ुशी में चहकते हुए बोलती है अरे धन्नो ऐसे चक्कर तो सबको आयें .. जा जल्दी से कुछ मीठा ले आ तू तो दादी बनने वाली है … तेरी बहु तो पेट से है …
धनपति की ख़ुशी का ठिकाना न रहा और रसोई से गुड लाकर सबका मुंह मीठा कराती है ये कहते हुए कि अभी तो गुड से काम चलाओ वेदपाल आयेगा तो लड्डू मंगवा कर बाटूंगी ….(इमरती कुछ देर बैठकर निकल जाती है बहु को कुछ जरुरी बाते बता कर क्या करना है कैसे चलना है कैसे उठाना बैठना है आदि आदि )
धनपति : बहु अब तुम बहुत ख्याल रखना अपने खाने पीने का मुझे मेरा पोता एकदम चाँद सा सुन्दर चाहिए …
सावित्री : पर माता जी क्या पता पोता होगा या पोती …. जो भी हो बस चाँद का टुकड़ा होना चाहिए !
धनपति : (गुस्से में) … बहु पोता ही चाहिए मुझे … कुछ दिन बाद जाकर चेक करा लेंगे मुझे बस पोता ही चाहिए जो मेरे वंश को आगे बढ़ाएगा … पराये धन का क्या करना है खिला पिलाकर हम बड़ा करेंगे और कमाएगी किसी और के घर जाकर ….
सावित्री चुप हो गयी क्यूंकि धनपति के सामने कुछ भी कह नहीं पाती थी आखिर धनपति धाकड़ बुढिया थी जिस से सावित्री तो क्या वेदपाल और यहाँ तक भोला सिंह भी डरते थे !
समय बीत गया और आखिर साढ़े-तीन महीने हो गए थे सावित्री को …
धनपति : ओ बहु सुन .. आज हस्पताल जाना है जल्दी से काम निबटा ले … बात कर ली है मैंने घर में सबसे … बेटी हुयी तो क्यों फालतू का झंझट मोल लिया … बेटा हुआ तो रखेंगे ..
सावित्री की तो मानो सांसे ही रुक गयी हों …. उसका दिल जोर जोर से धडकने लगा की पता नहीं क्या होगा … क्या मैं अपने बच्चे को जन्म दे पाऊँगी या नहीं … बेटियां क्या इतनी बुरी होती हैं जिनके पैदा होने पहले ही इतनी चिंता होने लगती है … पर अम्मा जी कहाँ मेरी सुनेंगी
दोनों हस्पताल पहुँच जाती हैं और डॉ से मिलती हैं
धनपति : डॉ साहब ये मेरी बहु है .. साधे तीन महीने पेट से हैं बस अब जल्दी से बता दो की बीटा है या बेटी … मैं आपका दराज पैसो से बहर दूंगी …
डॉक्टर : ठीक है ताई ..पर जन्म से पहले बच्चे के लिंग का पता लगाना कानूनन जुर्म है ! हम सिर्फ बच्चा ठीक है स्वस्थ है यही बता पाएंगे …. बाकी …
धनपति : अरे डोक्टर फ़िक्र क्यूँ करे है … बस तू दाम बता और फेर हम तो किसी को बताएँगे नहीं और आपने बताने की के जरुरत है … कानून ने कोणी पता चाले के बताया के नहीं …
डोक्टर : ठीक से ताई .. पर चोखी रकम देनी पड़ेगी फेर ही कुछ कर पाउँगा .. न ते तन्ने पता है कि कितना रिस्क भरा काम है …
धनपति : अच्छा ठीक है जो तू बोले …. बस म्हारा काम कर दे बाकि चिंता न कर …
सावित्री को जिसका डर था आखिर वहि हुआ … डोक्टर ने कहा कि लड़की ही है … ये सुनते ही धनपति ने कहा की ख़त्म कर दो नहीं चाहिए … मुझे तो बस लड़का ही चाहिए … सावित्री रोती रही हाथ पैर जोडती रही की मेरी बेटी को मत मारो जीने दो उसको .. उसको भी देखने दो दुनिया .. पर कहाँ चलने वाली थी !
धनपति ने एक तरफ पोती से पीछा छुड़ाकर राहत की सांस ली वहीँ दूसरी तरफ सावित्री को अब वो पहले की तरह प्यार से नहीं ट्रीट करती थी जब देखो ताने देती रहती की एक वारिस भी न दे सकी हमारे परिवार को … इन सबके चलते सावित्री अन्दर ही अन्दर घुटती रहती …. वेदपाल को कुछ कहती तो वो भी आग बबूला हो सावित्री आर ही बरस पड़ता ….
आखिर कुछ दिन बाद सावित्री को पता चला कि वो फिर से पेट से है लेकिन उसने सोचा कि अब अगर वो बताएगी तो फिर से वही होगा .. तो उसने कुछ दिन चुप रहने का ही सोचा लेकिन एक तो सावित्री कमजोर थी ऊपर से पेट से .. उसकी तेज सास को पता लगाने से भला कौन रोक सकता था ! अंततः धनपति को पता चल ही गया की सावित्री फिर से पेट से है और धनपति ने उसी डोक्टर से मिलने की बात की ….. फिर वही हुआ जो धनपति चाहती थी और सावित्री को डर था .. सावित्री की एक और संतान लड़के की चाह में मिट गयी …… ऐसा एक बार नहीं हुआ कई बार हुआ और सावित्री कुछ न कर सकी सिर्फ दुआ के कि अबकी बार देना हो तो बेटा दे ताकि वो अपनी संतान को जन्म दे सके वरना कुछ न दे …..
कुछ दिन बाद सावित्री फिर से पेट से थी शायद पांचवी बार … पहले चारो बार उसका गर्भपात करा दिया गया था और इस बार रामजाने क्या होगा … लेकिन इस बार शायद सावित्री की दुयाएँ कबूल हो गयी थी और जाँच में पता चला की सावित्री दो जुड़वाँ बेटो की माँ बन ने वाली है … धनपति ने लड्डू बंटवाएँ .. सावित्री भी खुश थी की अब वो माँ बन पायेगी सही मायने में …. और 9 महीनो बाद सावित्री ने दो चाँद से बेटो को जन्म दिया ! देसी घी का खाना किया गया पुरे गाँव और उसके आसपास के लोगो का … मंदिरों में दान दिया गया ….
धीरे धीरे दोनों बेटे बड़े होने लगे पढाई में चतुर थे दोनों ही और सबकी आशाओं पर खरे उतर रहे थे ! पढ़ लिखकर नौकरी लग गए लेकिन जैसा की आप जानते हैं हमारे हरियाणा में लडको के अनुपात में लड़कियां काफी कम हैं ! बहुत से कुवारें लड़के घूम रहे हैं ! ऊपर से जात बिरादरी का भेद अलग से ! अब उनके ही बेटो की शादियाँ हो रही हैं जिनके खुद एक बेटी है … बेटी दो बहु लो यही प्रथा चल पड़ी है ! धनपति को रातदिन चिंता सता रही है पोतो की शादी की लेकिन कुछ बात नहीं बन रही … एक दिन धनपति एक पड़ोस के दीनू काका से जिक्र करती है की काका कैसे भी करके मेरे पोतो की शादी करा दो … सारा खर्चा हम करेंगे बस लड़कियां ढूँढकर ला दो … काका भी हाजिर जवाबी थे बोले धनपति तुमने इतने पाप किये हैं हमसे क्या छुपे हैं .. तुमने खुद की कितनी पोतियाँ कुर्बान की हैं सिर्फ पोते की लालसा में … तेरी पोती होती तो कबकी तेरे भी पोतो की शादी हो चुकी होती ! अब चलाओ अपना वंश पोतो से ही …..

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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Malik Parveen के द्वारा
    August 8, 2014

    सादर धन्यवाद योगी जी

jlsingh के द्वारा
August 3, 2014

बेहतरीन रचना! आदरणीया परवीन जी, बहुत दिनों बाद आपने सत्य का दर्शन करती हुई रचना पेश की हैं, बहुत बहुत बधाई!

    Malik Parveen के द्वारा
    August 8, 2014

    सादर धन्यवाद जवाहर जी आपका हौसलाफजाई के लिए

चर्चित चित्रांश के द्वारा
August 2, 2014

अच्छा है…. जो सोया हो उसे जगाया जा सकता है …. जो स्वशोषित स्वप्नजीवी तो मदांध है….

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    जी चित्रांश जी ये स्कूल के लिए एक प्ले ल्खा था ताकि गाँव वाले कुछ सबक ले सकें जो कि अगले हफ्ते होना है बस यहाँ कहानी के रुप में दिया है … उम्मीद है एक संदेश जाये लोगों तक …. सादर

yamunapathak के द्वारा
August 2, 2014

परवीन जी यह मुद्दा बहुत विचारणीय है क्या बेटी क्या बीटा लोग सिर्फ संतान की चाह रखें विभेद ना करें साभार

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    जी यमुना जी काश लोग समझ पाएँ बेटियाँ भी उतनी ही जरुरी हैं जितने कि बेटे .. सादर धन्यवाद आपकी अनमोल टिप्पणी हेतु

sadguruji के द्वारा
August 2, 2014

बहुत सार्थक,शिक्षाप्रद और उपयोगी कहानी ! मुझे अफ़सोस हो रहा है कि इस मंच पर आये मुझे सालभर हो गए हैं,परन्तु पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ ! इस उत्कृष्ट रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये !

    चर्चित चित्रांश के द्वारा
    August 2, 2014

    आपकी ही तरह….

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    मैं भी बहुत दिन बाद पोस्ट डाली हूँ यहाँ पर … लगभग साल ही हो गया होगा …. आपने पढ़ा पसंद किया धन्यवाद …

nishamittal के द्वारा
August 2, 2014

सार्थक पोस्ट सन्देश परक

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    धन्यवाद निशा जी आपका

alkargupta1 के द्वारा
August 1, 2014

बहुत बढ़िया संदेशप्रद कहानी परवीन जी

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    धन्यवाद अलका मैम

Ravinder kumar के द्वारा
August 1, 2014

परवीन जी, बेहतरीन कहानी के लिए आपको बधाई. कहीं तो बेटों की इच्छा में बेटियों की लाइन लग रही है, तो कहीं बेटियों को जन्म ही नहीं लेने दिया जा रहा. दोनों ही स्थितियां हमारी बेटियों के प्रतिकूल हैं. परवीन जी, आजही मेरी एक छात्रा ने मुझे बताया के एक परिवार में चौथी बेटी के जन्म लेने पर, सभी उदास हैं. आप खुद ही सोचिये उस बेटी को परिवार में सम्मान मिल पायेगा ? क्या उसकी परवरिश उस तरह से होगी जिसकी वह हकदार है ? परवीन जी स्थितियां बड़ी विकट हैं. बेटियां माँ के पेट में सुरक्षित नहीं, बेटियां जन्म लेने के बाद सुरक्षित नहीं. कहानी के लिए आपको फिर बधाई.

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    रविंदर जी बेटियाँ हों तो भी जाने कितने डर एक माँ-बाप को सताते हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं की उन्हें जन्म ही न लेने दिया जाये … समाज के संतुलन के लिए बेटे जितने जरुरी हैं उतनी ही बेटियां भी .. आपकी अनमोल टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार

pkdubey के द्वारा
July 31, 2014

दिव्य कहानी है आदरणीया | कन्या दो -दो कुलों की तारणहार होती है |

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    हांजी बेटियां दो दो कुलों का मान बढाती हैं .. दो दो कुलों की शान हैं फिर भी उनकी ही सुरक्षा खतरे में है … आपकी अनमोल टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार आपका

Shobha के द्वारा
July 30, 2014

मलिका कहानी पढ़ कर मजा आ गया बहुत प्यारी कहानी बड़े तरीके से कहानी आगे बढ़ाई है डॉ शोभा

    Malik Parveen के द्वारा
    August 2, 2014

    आदरणीय शोभा जी मुझे जानकर अति प्रसन्ता हुयी की आपको कहानी अच्छी लगी … मेरा लिखना सार्थक हुआ सादर आभार आपका समय देने के लिए


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